भाषा का भविष्य क्या है?

सितम्बर 14, 2007

हिन्दी दिवस के मौके पर न तो मुझे हिन्दी पर दया आ रही है, और न मैं ये रोना रोने वाला हूं की हिन्दी का इस्तेमाल यहां नहीं होता, वहां नहीं होता.

असल में भाषा को मैं अभिव्यक्ति के साधन के अतिरिक्त कुछ नहीं मानता. शायद ये अत्यंत रेशनलिस्ट किस्म का नजरिया है, लेकिन मेरा मानना है की भाषा एक औजार है, इसका इस्तेमाल करना चाहिये बेहतर तरीके से खुद को अभिव्यक्त करने के लिये. सुंदरता से, और सटीकता से. इसके अतिरिक्त भाषा का क्या प्रयोजन हो सकता है?

आज इतने लेख दिखे. कुछ ने हिन्दी को दफना दिया, और दूसरों ने अंग्रेजी को गरियाया. इन्सानी फितरत है हर निज चीज़ के बारे में भावुक हो जाना. भाषा को अपना-अपना कह कर रोने का दिल मेरा तो नहीं करता, हालंकि हिन्दी पढ़ता हूं बहुत, लेकिन लक्ष्य हिन्दी पढ़ना नहीं होता, लिखे को पढ़ना होता है.

इसलिये हिन्दी की पैरवी नहीं करता, न उसके पाल्युशन पर रोना आता है. हिन्दी में अंग्रेजी शब्दों के मिक्सचर से विषाद नहीं होता. क्योंकि भाषा अभिव्यक्ति के लिये है, मेरे लिये है. मैं भाषा के लिये नहीं हूं.

वैसे भी भाषा कोई उथला तालाब नहीं है जो जस की तस बनी रहेगी. हिन्दी का भविष्य नहीं है. अंग्रेजी का भी नहीं है. भाषाओं को बदलना है. मैं क्यों परेशान करूं खुद को इसके लिये, जिसका स्वभाव ही बदलाव है?

इसलिये संदेश को मैसेज कहते में मुझे शर्म नहीं आती, पर्सनैलिटि को व्यक्तित्व कहने की जरुरत भी महसूस नहीं होती.

जो प्रचलित है, वही भाषा है. किसी भी चीज का प्रचलन जबरिया कराना आसान खेल नहीं है. अगर आपकी जिद है की आप ब्लाग को चिट्ठा कहेंगे तो कहते रहिये, जो शब्दार्थ पूछने की जहमत उठायेंगे वो आप को समझेंगे, बाकियों के पास समय कहां.

इसलिये प्रचलन का असम्मान यह कहकर नहीं करूंगा की इस पीढ़ी ने एक धरोहर नष्ट कर दी, या अंग्रेजी की गुलाम बन गयी, या जो भी आप कहते हों. अगर लोग मुझसे कहेंगे “हेई ड्यूड, कैसे हो?” तो इसका जवाब निश्चित ही “अत्य़ंत आनंद है मित्रवर” नहीं दूंगा. क्योंकि मेरा लक्ष्य अपनी ढपली बजाना नहीं, बात समझाना ही होगा.

हिन्दी में अंग्रेजी मिलाने के खिलाफ क्यों हैं आप? निश्चित मानिये ये संकर भाषा आपकी-मेरी शुद्ध भाषा से बहुत दिन ज्यादा जीयेगी.

वैसे भविष्य भी इन्टेग्रेशन (integration) का है. चाहे वो मानव नस्ल का हो, समाज का, सोच का, संस्कृति का, या भाषा का.

राज उसी का होगा जो उस संकरता को अपनायेगा, अपनी नस्ल या रूप शुद्ध रखने की कोशिश का नतीजा  पूर्ण विनाश (सम्पूर्ण विनाश) ही होगा. वर्ण संकरता, या भाषा संकरता डरने की चीज नहीं, सच्चाई है, और कुछ बुरी भी नहीं है.

पुरातन कबीलों को हक था संस्कृति में जकड़े रहने का, अपनी भाषा बनाने का, अलग-थलग साहित्य रचने का, क्योंकि वो सब सीमित था उन कबीलों तक. लेकिन आज सब संपूर्ण विश्व एक विशाल कबीला बनने की और अग्रसर है, तो एक homogenous समाज ही हो सकता है, निश्चित ही ये homogenousness भाषा पर भी लागू होगी.

जरूर इसमें कई भाषायें आज के स्वरूप के अनुसार नष्टप्राय ही हो जायेंगी. इसमें निश्चित ही हिन्दी नष्ट होगी, और अपवाद तो चीनी, फ़्रांसिसी, या फिर अंग्रेजी भाषा भी नहीं बनेंगी. वो भाषा जो इस विश्व की होगी कुछ नये से स्वाद की होगी. एक ऐसी भाषा जिसमें सारे स्वाद मिले होंगे.

वो भाषा न हिन्दी होगी, न अंग्रेजी, न कोई और. इसके संकेत तो सामने हैं… trends आंखों से दिखते हैं, कानों से सुनाई पड़ते हैं.

भाषा का भविष्य उसका इस्तेमाल करने वालों पर निर्भर है, ग्लोबलाइजेशन मांग रहा है इस एक विश्व के लिये एक ही भाषा, जिसका इस्तेमाल सभी करें जन्म, जाती, रंग और राष्ट्र से भी ऊपर उठकर.

Future of the language. An essay.

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2 Responses to “भाषा का भविष्य क्या है?”


  1. मैं नहीं जानता कि आप कौन हैं और कहां रहते हैं फिर भी एक बात आपसे कहना चाहता हूं.
    आपने भाषा को लेकर जो बातें कहीं हैं वे आपने अपने परिवेश के प्रभाव में आकर कहीं है. हमारी सोच हमारे परिवेश के आधार पर बनती है. और परिवेश का प्रभाव सर्वव्यापक कभी नहीं होता. वह कुछ दूरी में सिमटा होता है. संकट यह है कि हम अपने ही परिवेश को स्थापित सत्य मान लेते हैं और लोगों पर थोपते हैं.

    भूमंडलीकरण बरास्ता अमरीका एक फ्राड है. बाजार का भूमंडलीकरण जितना बढ़ेगा इंसानियत का संकट भी उतना ही विकराल होगा. विविधता खत्म होगी और इसके साथ ही खत्म होती चली जाएगी मनुष्य होने की उपयोगिता. एकरसता भी निरसता ही होती है और मनुष्य का स्वभाव परिवर्तन मांगता है. नयापन मांगता है, विविधता मांगता है. तो भूमंडलीकरण तो बाजारू ताकतों की धोखाधड़ी है. यह तो लंबा चलेगा नहीं.

    रहा सवाल भाषा, भूषा, भेषज का तो उसकी विविधता कायम रहना जरूरी है, यह विविधता ही हमारी उर्जाशक्ति है.

  2. rameshpatel Says:

    @Sanjay Tiwari ji

    आपकी बात बहुत कुछ उचित है, और बाजारिकरण की कुछ बातों से में सहमत भी हूं. लेकिन भूमंडलीकरण का बाजारीकरण से इतर भी एक चेहरा है. वो चेहरा है निजि स्तर (personal level) पर कम्युनिकेशन का. बाजार भी एक निमित्त है, अतंत: भूमंडलीकरण का dominant प्रभाव निजी स्तर पर संचार ही होगा.

    मेरी बात को अमेरिका के बाजारवाद के संदर्भ में न देखें. भाषा, समाज, और मानव की एकरूपता स्पष्ट नियति (manifest destiny) है. एकरूपता को अक्षरश: न लें. जितना मानव एक जैसा होगा, उतने ही नयापन पनपेगा. एकरसता के लिये मानव जीवन में स्थान नहीं.

    लेकिन निश्चित ही हर उस चीज़ में एकरूपता बढ़ेगी जिसका संबंध आपसी संचार से है. क्योंकि मानव के पहली तीन ज़रुरतों के बाद चौथी ज़रुरत कम्युनिकेशन ही है. इसलिये मेरा विश्वास है की वैश्विक भाषा स्पष्ट नियति है.


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