हिन्दी दिवस के मौके पर न तो मुझे हिन्दी पर दया आ रही है, और न मैं ये रोना रोने वाला हूं की हिन्दी का इस्तेमाल यहां नहीं होता, वहां नहीं होता.

असल में भाषा को मैं अभिव्यक्ति के साधन के अतिरिक्त कुछ नहीं मानता. शायद ये अत्यंत रेशनलिस्ट किस्म का नजरिया है, लेकिन मेरा मानना है की भाषा एक औजार है, इसका इस्तेमाल करना चाहिये बेहतर तरीके से खुद को अभिव्यक्त करने के लिये. सुंदरता से, और सटीकता से. इसके अतिरिक्त भाषा का क्या प्रयोजन हो सकता है?

आज इतने लेख दिखे. कुछ ने हिन्दी को दफना दिया, और दूसरों ने अंग्रेजी को गरियाया. इन्सानी फितरत है हर निज चीज़ के बारे में भावुक हो जाना. भाषा को अपना-अपना कह कर रोने का दिल मेरा तो नहीं करता, हालंकि हिन्दी पढ़ता हूं बहुत, लेकिन लक्ष्य हिन्दी पढ़ना नहीं होता, लिखे को पढ़ना होता है.

इसलिये हिन्दी की पैरवी नहीं करता, न उसके पाल्युशन पर रोना आता है. हिन्दी में अंग्रेजी शब्दों के मिक्सचर से विषाद नहीं होता. क्योंकि भाषा अभिव्यक्ति के लिये है, मेरे लिये है. मैं भाषा के लिये नहीं हूं.

वैसे भी भाषा कोई उथला तालाब नहीं है जो जस की तस बनी रहेगी. हिन्दी का भविष्य नहीं है. अंग्रेजी का भी नहीं है. भाषाओं को बदलना है. मैं क्यों परेशान करूं खुद को इसके लिये, जिसका स्वभाव ही बदलाव है?

इसलिये संदेश को मैसेज कहते में मुझे शर्म नहीं आती, पर्सनैलिटि को व्यक्तित्व कहने की जरुरत भी महसूस नहीं होती.

जो प्रचलित है, वही भाषा है. किसी भी चीज का प्रचलन जबरिया कराना आसान खेल नहीं है. अगर आपकी जिद है की आप ब्लाग को चिट्ठा कहेंगे तो कहते रहिये, जो शब्दार्थ पूछने की जहमत उठायेंगे वो आप को समझेंगे, बाकियों के पास समय कहां.

इसलिये प्रचलन का असम्मान यह कहकर नहीं करूंगा की इस पीढ़ी ने एक धरोहर नष्ट कर दी, या अंग्रेजी की गुलाम बन गयी, या जो भी आप कहते हों. अगर लोग मुझसे कहेंगे “हेई ड्यूड, कैसे हो?” तो इसका जवाब निश्चित ही “अत्य़ंत आनंद है मित्रवर” नहीं दूंगा. क्योंकि मेरा लक्ष्य अपनी ढपली बजाना नहीं, बात समझाना ही होगा.

हिन्दी में अंग्रेजी मिलाने के खिलाफ क्यों हैं आप? निश्चित मानिये ये संकर भाषा आपकी-मेरी शुद्ध भाषा से बहुत दिन ज्यादा जीयेगी.

वैसे भविष्य भी इन्टेग्रेशन (integration) का है. चाहे वो मानव नस्ल का हो, समाज का, सोच का, संस्कृति का, या भाषा का.

राज उसी का होगा जो उस संकरता को अपनायेगा, अपनी नस्ल या रूप शुद्ध रखने की कोशिश का नतीजा  पूर्ण विनाश (सम्पूर्ण विनाश) ही होगा. वर्ण संकरता, या भाषा संकरता डरने की चीज नहीं, सच्चाई है, और कुछ बुरी भी नहीं है.

पुरातन कबीलों को हक था संस्कृति में जकड़े रहने का, अपनी भाषा बनाने का, अलग-थलग साहित्य रचने का, क्योंकि वो सब सीमित था उन कबीलों तक. लेकिन आज सब संपूर्ण विश्व एक विशाल कबीला बनने की और अग्रसर है, तो एक homogenous समाज ही हो सकता है, निश्चित ही ये homogenousness भाषा पर भी लागू होगी.

जरूर इसमें कई भाषायें आज के स्वरूप के अनुसार नष्टप्राय ही हो जायेंगी. इसमें निश्चित ही हिन्दी नष्ट होगी, और अपवाद तो चीनी, फ़्रांसिसी, या फिर अंग्रेजी भाषा भी नहीं बनेंगी. वो भाषा जो इस विश्व की होगी कुछ नये से स्वाद की होगी. एक ऐसी भाषा जिसमें सारे स्वाद मिले होंगे.

वो भाषा न हिन्दी होगी, न अंग्रेजी, न कोई और. इसके संकेत तो सामने हैं… trends आंखों से दिखते हैं, कानों से सुनाई पड़ते हैं.

भाषा का भविष्य उसका इस्तेमाल करने वालों पर निर्भर है, ग्लोबलाइजेशन मांग रहा है इस एक विश्व के लिये एक ही भाषा, जिसका इस्तेमाल सभी करें जन्म, जाती, रंग और राष्ट्र से भी ऊपर उठकर.

Future of the language. An essay.

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सर्व श्री सारथी जी,

आपने अपने लेख में मूल प्रश्न को भुला के धांसू उपमा चिपका दी. लीजिये, आगे के इस्तेमाल के लिये एकाध और भी दे रहा हूं.

— यह कैसे हो सकता है कि आप भैंस दुह भी लें और किसी पड़ोस की गुजरिया को ताड़ भी लें.
— यह कैसे हो सकता है कि फटा पजामा सी भी लें और पजामा फाड़ने वाले चूहों को गरिया भी लें.

आगे हम जानते हैं कि आपका विश्वास अटल है. भगवान के बारे में निर्णय आप ले चुके हैं, और हम कितना ही समझा लें आप सारा लाजिक ताक पर रख कर अपने विश्वास पर अटल रहने वाले हैं.

आस्तिकता की नींव अंध रूप से विश्वास ही हो सकता है. उसके बिना कोई आस्तिक बन ही नहीं सकता. जब आपने प्रश्न पूछना ही छोड़ दिया तो इस मामले में आपसे सर फोड़ के क्या लाभ?

आपको तो सिर्फ यहीं नहीं पता की खुदा होता है. आपको तो उसके रूप, प्रकार, संख्या, आचार, व्यवहार, नियम, आदतें, शौक, दोस्त, दुश्मन, कार्य, आदी सभी के बारे में सही-सही जानकारी है. आपके पास खुदा का जो ’यूजर मैनुअल’ है, उसे पट रैफर करके आप किसी भी बात के बारें में सटीक निर्णय दे सकते हैं.

नास्तिकता के दर्शन का अध्ययन शायद ही किया हो, लेकिन बड़े मजे से सबको गलत ठहरायेंगे. खुदा मैंने देखा, मैंने समझा, इसको-उसको चंगा किया, प्रार्थना से दंगा किया, आदी गफलतों में डाल कर सबको उल्लू बनायेंगे.

लेकिन किसी ने कहा है

you can fool some people some time
but you can’t fool all the people all the time

ये लोग जो ‘all’ में नहीं होते आपके खुदा की असलियत जानते हैं.

हम वो हैं जो न गिरिजा का घंटा बजाते हैं
हम वो हैं जो न मन्दिर में शीश नवाते हैं
हम वो हैं जो न सिजदे में माथा झुकाते हैं
हम वो हैं जो खुदा से न डरते न डराते हैं

और होंगे जो डर से घबराते हैं
हम तो खुल्ले में खिल्ली उड़ाते हैं

 ये भी सुनिये….

तुम झुको कायनात के सामने
हम उसको अपना नौकर बनाते हैं

और याद रखना….

प्रार्थना करोगे तो देगा सहारा
चमचों पे वारी खुदा है तुम्हारा

infidels.org

हम अधर्मी नहीं, विधर्मी हैं

भाई, बिना नित्यकर्म करे भगवान का सामना कैसे करूं? शास्त्र जरूर इसकी इजाजत नहीं देते होंगे. अगर देते हैं तो बता दो.

लेकिन जाने में बड़ी दिक्कत है. दिक्कत ये है की अपने १०० करोड़ के देश में शौचालयों की बड़ी कमी है. एक अनुमान के अनुसार हर १४०० लोगों में एक शौचालय है. अब इतनी लंबी कतार लगी है. न जाने मेरा नंबर कब आयेगा.

कुछ दिन पहले सुना की दिल्ली का अ़क्षरधाम मंदिर बनाने में २०० करोड़ रुपये खर्च हो गये. सुनकर थोड़ी और जोर से लग आई. लेकिन जाने की समस्या बरकरार थी. अब आप मुझे माफ करें लेकिन मैं खुद को ये सोचने से रोक नहीं पाया की २०० करोड़ में कितने शौचालय बनते.

मेरे खयाल से एक जनता के इस्तेमाल के लायक शौचालय बनाने में जिसमें नहाने की व्यवस्था भी हो ७०-८०,००० रुपये से ज्यादा क्या खर्च आयेगा. मतलब २५,००० शौचालयों की जगह अक्षरधाम मंदिर बन गया! अगर इतने शौचालय और बन जाते तो निश्चय ही जितने लोग अ़क्षरधाम जाते हैं, उससे ज्यादा लोग वहां जाते, और धन्य हो लेते.

सचमुच अगर मुझे जोर से लग नहीं रही होती तो शायद ये खयाल न भी आता. लेकिन बात वही है, जब हालात खस्त तो भगवान से दुआ भी यही निकलती है, कि या खुदा, कहीं कोई अच्छी जगह दिखला दे.

वैसे हम जानते भी हैं की हाजत इबादत से कुछ कम नहीं. हम मंदिर रोज जायें न जायें, वहां जरुर हो आते हैं.

तो मने भगवान दी सौं, अगर पटेला जट्ट नहीं होता तो शायद ये दूसरा ख्याल भी न आता. लेकिन जब आ ही गया तो बता ही दूं.

क्यों न २०० करोड़ दे शौचालयों दे नाल इक्क छोटा मंदिर भी बनवा दें? लोग रोज सुबह जायेंगे, और आते समय दर्शन भी कर लेंगे.

आगे खबर ये है

लोटा ले-ले फिर रेया
दिल दे विच्च ले आस

खुदा मिले या न मिले
मिल जाये संडास

सर जी इस गरीब से गुजारिश है, अक्षरधाम के २०० करोड़ से तो नहीं किया, अब वहां चढ़ने वाले चंदे से ही सही मेरे जैसे लोगों की तड़्प मिटाने के लिये कुछ संडास बनवा दे.

खुदा कसम मंदिर जाने वाले वैसी दुआयें क्या देंगे, जो वहां जाने वाले देंगे.

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साड्डा सारे नानू ते मोटा भाइयों ते बहनों नूं परनाम!

मैं पेलो पटेल सूं जे पंजाब विच रैण के कारन आधा पंजाबी ते आधा गुजराती है गयो सूं. अज्ज त्वाडे ब्लाग जोइ जोइ के आ ब्लाग जगत मा साड्डा दिल वी शामिल होने दा करे छे. तमे मारा जोश बढान माटे एकाध टिप्पणी आ ब्लाग मा करि शकु?

वैसे मुझे हिन्दी भी आती है. और angrezi भी…

ये ब्लाग जगत हिन्दी का है, इसलिये आगे बातें हिन्दी में ही होंगी. अगर एकाध शब्द गुजराती या पंजाबी दा आ जावे तो मने माफ कर दित्त सी!

छोड़ आये हम, वो गलियां

वो मेरा देश, वो शहर
वो गलियां, वो मैदान, मेरे दोस्त, मेरा घर
कल ही तो छोड़े थे मैंने
फिर भी अनजान बने ऐसे जैसे बीती हो उमर.

वक्त के आंचल में सिमट गईं थीं यादें मेरी
ले गयी उनको बहाकर बदलने की लहर
अब आया हूं तो पाया कुछ नहीं वैसा
वक्त ठहरा नहीं जिस मोड़ पर गया था मैं ठहर