सारथी जी का खुदा, मेरी खुदी से बुलंद नहीं
August 28, 2007
सर्व श्री सारथी जी,
आपने अपने लेख में मूल प्रश्न को भुला के धांसू उपमा चिपका दी. लीजिये, आगे के इस्तेमाल के लिये एकाध और भी दे रहा हूं.
– यह कैसे हो सकता है कि आप भैंस दुह भी लें और किसी पड़ोस की गुजरिया को ताड़ भी लें.
– यह कैसे हो सकता है कि फटा पजामा सी भी लें और पजामा फाड़ने वाले चूहों को गरिया भी लें.
आगे हम जानते हैं कि आपका विश्वास अटल है. भगवान के बारे में निर्णय आप ले चुके हैं, और हम कितना ही समझा लें आप सारा लाजिक ताक पर रख कर अपने विश्वास पर अटल रहने वाले हैं.
आस्तिकता की नींव अंध रूप से विश्वास ही हो सकता है. उसके बिना कोई आस्तिक बन ही नहीं सकता. जब आपने प्रश्न पूछना ही छोड़ दिया तो इस मामले में आपसे सर फोड़ के क्या लाभ?
आपको तो सिर्फ यहीं नहीं पता की खुदा होता है. आपको तो उसके रूप, प्रकार, संख्या, आचार, व्यवहार, नियम, आदतें, शौक, दोस्त, दुश्मन, कार्य, आदी सभी के बारे में सही-सही जानकारी है. आपके पास खुदा का जो ’यूजर मैनुअल’ है, उसे पट रैफर करके आप किसी भी बात के बारें में सटीक निर्णय दे सकते हैं.
नास्तिकता के दर्शन का अध्ययन शायद ही किया हो, लेकिन बड़े मजे से सबको गलत ठहरायेंगे. खुदा मैंने देखा, मैंने समझा, इसको-उसको चंगा किया, प्रार्थना से दंगा किया, आदी गफलतों में डाल कर सबको उल्लू बनायेंगे.
लेकिन किसी ने कहा है
you can fool some people some time
but you can’t fool all the people all the time
ये लोग जो ‘all’ में नहीं होते आपके खुदा की असलियत जानते हैं.
हम वो हैं जो न गिरिजा का घंटा बजाते हैं
हम वो हैं जो न मन्दिर में शीश नवाते हैं
हम वो हैं जो न सिजदे में माथा झुकाते हैं
हम वो हैं जो खुदा से न डरते न डराते हैं
और होंगे जो डर से घबराते हैं
हम तो खुल्ले में खिल्ली उड़ाते हैं
ये भी सुनिये….
तुम झुको कायनात के सामने
हम उसको अपना नौकर बनाते हैं
और याद रखना….
प्रार्थना करोगे तो देगा सहारा
चमचों पे वारी खुदा है तुम्हारा
infidels.org
हम अधर्मी नहीं, विधर्मी हैं

August 28, 2007 at 6:29 pm
बहुत जबर्दस्त लिखा है प्यारे
August 28, 2007 at 6:32 pm
जब आपको मालूम है कि इनका विश्वास अटल है, भगवान के बारे में निर्णय ये ले चुके हैं तो इनको समझाने का क्या फायदा?
जाने भी दो यारो
August 28, 2007 at 8:03 pm
“हम अधर्मी नहीं, विधर्मी हैं”
चलिये आपने आपने आपको स्पष्ट कर दिया.
मेरे लेख पर संवाद आगे बढाने के लिये आभार. लेकिन लेख का मर्म आपने नजर अंदाज कर दिया. चलिये फिर कभी उस पर भी चर्चा कर लेंगे — शास्त्री जे सी फिलिप
हिन्दी ही हिन्दुस्तान को एक सूत्र में पिरो सकती है
http://www.Sarathi.info
August 28, 2007 at 8:17 pm
श्लोकार्धेन प्रवक्ष्यामि यदुक्तं शास्त्रकोटिभि:।
ब्रह्म सत्यं जगन्मिथ्या जीवो ब्रह्मैव नापर:॥
अहं ब्रह्मास्मि…।
August 29, 2007 at 2:28 am
दिव्याभ जी अर्थ भी बताइये ।
घुघूती बासूती
August 29, 2007 at 7:49 am
आप विधर्मी है;
बहुत अच्छा है। इस दुनिया का के धर्म के पंडों, पोपों, मुल्ला, मौलवियों, पुजारियों, पादरियों ने जितना सत्यानाश किया है इससे तो आदमी का विधर्मी होना ही सही है।
लेकिन आपका नजरिया धर्म की बोरी ढोने वाले हम्माल नहीं समझ पायेंगे। इन पर अपनी ऊर्जा और समय बर्बाद न करें। आदमी जब धर्म की बोरी अपनी पीठ पर लाद लेता है तो उसकी समस्त इन्द्रियां अचैतन्य हो जाती हैं।
August 29, 2007 at 11:53 am
सारथी जी, यहां एक बात साफ कर दूं.
मेरे विधर्मी का मतलब दूसरे धर्म का नहीं. हम हर धर्म के लिये विधर्मी हैं, क्योंकि हम हर धर्म विरुद्ध हैं. इस दुनिया के इन बुरे हालातों की सबसे बड़ी जिम्मेवारी धर्म की ही है. इस बात का कभी दिल से अन्वेषण कीजियेगा.