मुझे मंदिर नहीं शौचालय जाना है
August 17, 2007
भाई, बिना नित्यकर्म करे भगवान का सामना कैसे करूं? शास्त्र जरूर इसकी इजाजत नहीं देते होंगे. अगर देते हैं तो बता दो.
लेकिन जाने में बड़ी दिक्कत है. दिक्कत ये है की अपने १०० करोड़ के देश में शौचालयों की बड़ी कमी है. एक अनुमान के अनुसार हर १४०० लोगों में एक शौचालय है. अब इतनी लंबी कतार लगी है. न जाने मेरा नंबर कब आयेगा.
कुछ दिन पहले सुना की दिल्ली का अ़क्षरधाम मंदिर बनाने में २०० करोड़ रुपये खर्च हो गये. सुनकर थोड़ी और जोर से लग आई. लेकिन जाने की समस्या बरकरार थी. अब आप मुझे माफ करें लेकिन मैं खुद को ये सोचने से रोक नहीं पाया की २०० करोड़ में कितने शौचालय बनते.
मेरे खयाल से एक जनता के इस्तेमाल के लायक शौचालय बनाने में जिसमें नहाने की व्यवस्था भी हो ७०-८०,००० रुपये से ज्यादा क्या खर्च आयेगा. मतलब २५,००० शौचालयों की जगह अक्षरधाम मंदिर बन गया! अगर इतने शौचालय और बन जाते तो निश्चय ही जितने लोग अ़क्षरधाम जाते हैं, उससे ज्यादा लोग वहां जाते, और धन्य हो लेते.
सचमुच अगर मुझे जोर से लग नहीं रही होती तो शायद ये खयाल न भी आता. लेकिन बात वही है, जब हालात खस्त तो भगवान से दुआ भी यही निकलती है, कि या खुदा, कहीं कोई अच्छी जगह दिखला दे.
वैसे हम जानते भी हैं की हाजत इबादत से कुछ कम नहीं. हम मंदिर रोज जायें न जायें, वहां जरुर हो आते हैं.
तो मने भगवान दी सौं, अगर पटेला जट्ट नहीं होता तो शायद ये दूसरा ख्याल भी न आता. लेकिन जब आ ही गया तो बता ही दूं.
क्यों न २०० करोड़ दे शौचालयों दे नाल इक्क छोटा मंदिर भी बनवा दें? लोग रोज सुबह जायेंगे, और आते समय दर्शन भी कर लेंगे.
आगे खबर ये है
लोटा ले-ले फिर रेया
दिल दे विच्च ले आस
खुदा मिले या न मिले
मिल जाये संडास
सर जी इस गरीब से गुजारिश है, अक्षरधाम के २०० करोड़ से तो नहीं किया, अब वहां चढ़ने वाले चंदे से ही सही मेरे जैसे लोगों की तड़्प मिटाने के लिये कुछ संडास बनवा दे.
खुदा कसम मंदिर जाने वाले वैसी दुआयें क्या देंगे, जो वहां जाने वाले देंगे.
Technorati Tags: Toilet, Akshargram, God, Sanitation

August 18, 2007 at 12:26 am
वैसे भाई रमेश अमरीका,चीन,भारत सहित दुनिया के सभी प्रमुख देश अपने सैन्य खर्चों में थोड़ी कटौती कर दें तो शौचालय की समस्या और आसानी से हल हो सकती है और किसी की भावना को ठेस भी नहीं पहुंचेगी. अच्छा हुआ जो आपने पखाने के साथ मस्जिद बनाने की बात नहीं की. कौन जाने लादेन ही पढ़ लेता. फिर?
August 18, 2007 at 2:50 am
आदमी को बेशक मंदिर से ज्यादा टॉयलेट की ज़रूरत है. ख़ुदा दिल में बसता है लेकिन टॉयलेट एक बुनियादी ज़रूरत है. अच्छा है, सही लिखा है.
August 18, 2007 at 4:58 am
बात तो सही है। सुलभ शौचालय वालों ने इस दिशा में काम तो किया है।
स्वागत है आपका हिन्दी चिट्ठाजगत में।
August 18, 2007 at 5:03 am
बिल्कुल सटीक और सधे शब्दों में आपने हम लोगों की मानसिकता पर कटाक्ष किया है कि मन्दिर तो बनाए जा सकते हैं करोडों खर्च करके लेकिन बुनयादी ज़रूरतों के लिये हमारे पास पैसा नही है या फिर हमारी सोच का दायरा ही इतना छोटा है …… बस यूं ही लिखते रहिए
August 18, 2007 at 6:06 am
धन्य हो महाराज. अब पहले हो ही आओ, फिर टिप्पणी अप्रूव कर देना, जल्दी नहीं है.
August 18, 2007 at 10:04 am
“…कुछ दिन पहले सुना की दिल्ली का अ़क्षरधाम मंदिर बनाने में २०० करोड़ रुपये खर्च हो गये. सुनकर थोड़ी और जोर से लग आई….”
सही कहा. कुछ साल पहले हरिद्वार गया था. हरकी पौड़ी पर लाखों श्रद्धालु रोज जुटते हैं. पूरे दस किलोमीटर के मेला जैसे पवित्र क्षेत्र में एक भी शौचालय नहीं दिखा. व्यवस्था देख के यह भ्रम हो सकता है कि भक्तों को जो भगवान में रमे होते हैं – या मेले में – लगती ही नहीं है. मगर फिर कइयों को यत्र तत्र मंदिर नुमा भवनों के पिछवाड़े निपटते देखा तो यह धारणा ध्वस्त हो गई…
August 18, 2007 at 12:16 pm
इस प्रविष्टि पर आप सबकी टिप्पणियों का धन्यवाद, वैसे मने लग रेया सी की गालियां पड़ेगीं.
संजीव जी – मैं लादेन से क्या डरूंगा,वो तो खुद अपनी जान बचान के लिये मुंह छिपाये घूम रहा है. मेरे लेख में जहां-जहां मंदिर लिखा है, वहां आप मस्जिद, गुरुद्वारा, अगियारा, घसियारा, जो चाहे पढ़ लें.
अनामदास ब्लागर जी – जब लगती है, तब आपकी बात की महत्ता समझ आती है.
उन्मुक्त जी – हम भी सुलभ में बरसों गयें हैं. भला हो उनका.
राजीव जी – सही बात है गुरुजी.
समीर जी – हम उस समस्या से निपट चुके साहेब, अब शांति है.
रवि जी – आपको धोखा हुआ होगा सर जी, वो तो योग के साधक थे जो करकरासन लगा रहे थे.
August 19, 2007 at 1:00 am
सही!! बिलकुल सही कहा भैय्या!!
शुभकामनाओं के साथ स्वागत है हिन्दी चिट्ठाजगत में!!
August 29, 2007 at 7:51 am
लोटा ले-ले फिर रेया
दिल दे विच्च ले आस
खुदा मिले या न मिले
मिल जाये संडास
सही लिखा है मेरे भईया, खुदा के बिना रहा और जिया जा सकता है पर संडास के बिना नहीं।